समन्दर



समंदर की जैसे इक चादर सी बिछी हो इस ज़मीं पे,
हज़ारों राज़ छिपाये अपनी गहराई में,
मानो कह रहा हो कुछ आसमाँ से,
कि "ऐ नीले आसमाँ, मुझे भी अपनी तरह उस खुदा का आशियाँ बना,
दिल जलता है उस अब्र को देखकर जिससे तेरा ताउम्र का दोस्ताना है!

मैं भी उन बेफिक्र परिंदों की तरह तुझमें उड़ना चाहता हूँ,
इस ज़मीं के पिंजरे को तोड़ना चाहता हूँ...
अपने अंदर के तूफानों से जूझते जूझते थक गया हूँ मैं,
अब ज़रा से सुकूँ से तो मुलाकात करा!

लोगों को मेरी खामोशी से कई गुमां होते हैँ,
पर कैसे सुनाऊँ उन्हें अपनी आहों की गूँज!
कैसे दिखाऊँ उन्हें अपनी बेकसी का आलम!
एक नन्ही कश्ती का सहारा तो मैं हूँ,
पर मेरा सहारा कौन है?
मुझे भी तो साहिल का दीदार करा...

खुदा ने आफताब के नूर से नवाज़ा है तुझे,
दो बूँद रौशनी की मुझमे भी तो छलका!
लोग कहते हैँ कि किसी छोर पे तू मुझमे समाता है,
और तेरा अक्स मुझपे उभर आता है,
पर ये तो इक हसीन धोखा है,
जो हकीकत से मात खा जाता है...

हमारी आशनाई की ग़ज़ल तो ये लहरें भी गुनगुनतीं हैं,
अपने अरमानों के पँख फैलाये,
खौफनाक चट्टानों से बेखबर,
तेरे दीदार के लिए मचल जाती हैँ...
अब कौन समझाए इन्हें कि इनका अँजाम तो सिर्फ़ टूटकर बिखर जाना है,
मगर ये फिर से हौंसलो की मुसकान होंठों पे सजाये,
ख्वाबों के टूकड़े बटोरने उठती हैं, फिर गिरतीं हैँ, फिर उठती हैँ,
बस थोड़ा सा आसमान अपने दामन में छुपाने...

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