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Showing posts from April, 2020

चारदीवारी

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आजकल हमने चारदीवारी में क़ैद होकर, एक गज़ब का काम करना सीख लिया, पहले तो हवा से बातें किया करते थे, आजकल खुद से ही बातें करना सीख लिया... कभी लोगों के काफ़िले में चला करते थे, आजकल अकेले ही चलना सीख लिया... चंद रोज़ पहले फ़र्ज़ के शोर में अपनी ही धड़कनों की आवाज़ सुनाई नहीं देती थी, आजकल हमने अपनी एक एक धड़कन का साज़ सुनना सीख लिया... घड़ी के काँटों पर अपना हक़ समझ बैठे थे, आजकल हर लम्हे की क़दर करना सीख लिया.. पहले तो सिर्फ़ चाँद से दोस्ती किया करते थे और आसमान में उड़ा करते थे, आजकल तो हमने ज़मीन पे रहकर सूरज को भी दुआ सलाम करना सीख लिया.. कभी तो दिन के उजाले की ताज़गी से ये होंठ खिल जाते थे, आजकल तो रात के आईने में देखकर भी मुस्कुराना सीख लिया... चंद रोज़ पहले ज़िंदगी का बहाव कुछ धीमा सा लगा करता था, आजकल तो कतरे कतरे सी बहती इस ज़िंदगी का भी शुक्रगुज़ार होना सीख लिया... इस चारदीवारी के ठहराव ने हमें वो सिखा दिया जो बादलों की रफ़्तार ना सिखा सकी, तभी तो हमने सब्र का बाँध बनाना सीख लिया.. हाँ, हमने इस चारदीवारी की हर ईंट से मोहोब्बत करना सीख लिया..

दूसरों के लिए

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दूसरों के लिए तो रोज़ ही जीते हो, खुद के लिए भी जीके देखो ज़रा, कभी तो अपनी ख़्वाहिशों के मोतियों को, फ़र्ज़ के समन्दर से ढूँढ के देखो ज़रा,  कतरे कतरे सी बहती इस ज़िन्दगी को, कभी तो अपने दामन में समेटके देखो ज़रा, सब रिश्तों को रखो उस कोने में तुम, और ज़िन्दगी के साज़ पे अकेले थिरक के देखो ज़रा, कभी तो क़ायदों की जंजीरों से निकलकर, आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में उड़कर देखो ज़रा, उस सुबह से दोस्ती करने को तो हमेशा ही बेचैन रहते हो, कभी रात की तरफ़ बाहें फ़ैलाकर भी देखो ज़रा, खुशियाँ बटोरने में हर वक़्त मसरूफ़ रहते हो, कभी ग़मों को भी ज़िन्दगी का एक हिस्सा समझ के देखो ज़रा, एक बार तो खुद के लिए जीके देखो ज़रा....

वक़्त वक़्त की बात

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आज बड़े अरसे के बाद ज़िन्दगी की भाग दौड़ से ज़रा फ़ुरसत मिली, तो दिल के शहर का मुआना करने बैठे, अजब सा सूनापन था दिल के ज़मीन पे, और धड़कनों के घरों में भी सन्नाटा छाया था, फिर ज़हन में एक सवाल आया कि, आज इस दिल की गलियाँ यूँ बियाबान क्यूँ हैं, जहाँ उम्मीद के फूल खिला करते थे, आज मायूसी का सेहरा क्यूँ है, बस दो बूँद ख़ुशी के ही तो माँगे थे उस परवरदिगार से, फिर हमारी झोली में ग़मों का दरिया क्यूँ है... शायद वक़्त वक़्त की बात है, हम आज भी इसके मोहताज हैं, कभी तो ये कम्बख्त मिलेगा कहीं, तब हम एक फ़रियाद करेंगे उससे और कहेंगे, कि ऐ वक़्त, ले चल हमें उस लम्हे में, जब खुशियाँ सस्ती हुआ करतीं थीं, आजकल तो ये आलम है कि, ज़रा सी खुशी खरीद भी लें, तो दुनिया हमसे हमारी औकात पूछती है, हमारी ही ख़ुशी का हमसे हिसाब पूछती है, ये कमज़र्फ दुनिया हमारे होने का सुबूत ढूँढती है...