दूसरों के लिए

दूसरों के लिए तो रोज़ ही जीते हो,
खुद के लिए भी जीके देखो ज़रा,
कभी तो अपनी ख़्वाहिशों के मोतियों को,
फ़र्ज़ के समन्दर से ढूँढ के देखो ज़रा, 
कतरे कतरे सी बहती इस ज़िन्दगी को,
कभी तो अपने दामन में समेटके देखो ज़रा,
सब रिश्तों को रखो उस कोने में तुम,
और ज़िन्दगी के साज़ पे अकेले थिरक के देखो ज़रा,
कभी तो क़ायदों की जंजीरों से निकलकर,
आज़ाद परिंदे की तरह आसमान में उड़कर देखो ज़रा,
उस सुबह से दोस्ती करने को तो हमेशा ही बेचैन रहते हो,
कभी रात की तरफ़ बाहें फ़ैलाकर भी देखो ज़रा,
खुशियाँ बटोरने में हर वक़्त मसरूफ़ रहते हो,
कभी ग़मों को भी ज़िन्दगी का एक हिस्सा समझ के देखो ज़रा,
एक बार तो खुद के लिए जीके देखो ज़रा....

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