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शायर की फ़रियाद

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उन्होंने कहा लिखना छोड़ो, तुम अपनी कलम से लफ्ज़ों को बहाना छोड़ो, ये कोई असली काम नहीं, इससे पैसों का कोई इंतज़ाम नहीं, शायर तो हर गली में फिरते हैं, तुम ऐसा क्या कर लोगे, जो उस फ़लक के चाँद को धर लोगे!  मैंने कहा मुझे ना पैसा चाहिए ना शोहरत, बस दिल की कहानी सुनाना चाहता हूँ, कुछ जज़बात जो मर गए हैं, उन्हें फिर से ज़िन्दा करना चाहता हूँ, शायद मेरे हिस्से ख़ुशी नहीं आयी, पर अपने लफ्ज़ों से लोगों में खुशियाँ बाँटना चाहता हूँ, प्यार, दोस्ती, वफ़ा, और इंसानियत के रँग, जो अब फीके पड़ गए हैं, उन्हें अपनी कलम से फिर गहरा करना चाहता हूँ,  हक़ीक़त की ज़मीन से डर लगता है, मैं ख्वाबों के आसमान में उड़ना चाहता हूँ, मुझे मत रोको, मैं सिर्फ़ लिखना चाहता हूँ...

शुक्रिया अदा करते हैं

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शुक्रिया, धन्यवाद, thank you, merci... ये सब बड़े कमाल के शब्द हैं.. और अगर इनमें एक प्यारी सी smile भी जोड़ दो तो ये रूठे हुए अपनों को मना भी सकते हैं और किसी अन्जान से दोस्ती भी करा सकते हैं.. इस शब्द में बहुत modesty है...और science तो ये भी कहती है कि gratitude leads to overall happiness and combats depression...है ना amazing बात, कि ये छोटा सा शब्द कितनी खुशी दे सकता है!!! यहाँ US में एक festival मनाते हैं जिसे thanksgiving कहते हैं... ये बड़ा ही प्यारा festival है.. उस दिन सब लोग अपनों के साथ वक़्त बिताते हैं, खाते हैं, पीते हैं और मज़े करते हैं.. और बस भगवान से thank you बोलते हैं कि वो साथ हैं...तो आज मैं भी इस कविता के ज़रिए उन सबको thank you बोलती हूँ जो मेरी ज़िन्दगी में मायने रखते हैं... शुक्रिया अदा करते हैं हम आज ज़िन्दगी का, जिसने हमें खुद को जीने का एक मौका दिया, हर रोज़ एक नई सुबह देखने का तोहफ़ा दिया, हर ख्वाब मुक्कम्मल करने का हौंसला दिया, जो कभी कभी हमसे रूठ जाती है, पर फिर अपनों सी मान भी जाती है, इस ज़िन्दगी ने हर रोज़ नये रँग दिखाकर हमको हैरान किया... शु...

हम क्यूँ सोचते हैं

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कभी life में ये सोचकर, कि "लोग क्या कहेंगे" खुद को अपनी मर्ज़ी का काम करने से रोका है?  जैसे कोई अलग career चुनना जो doctor, engineer या mba ना हो, या फिर दुनिया की सारी जंजीरें तोड़के प्यार करना, या फिर वो कपड़े पहनना जिनकी length दुनिया ने नहीं बल्कि तुमने decide की है, या फिर अकेले जाकर hall में picture देखना... अमा छोड़ो यार ये should I do this, or should I not की confusion... ये बेकार की बातें सोचकर सोचकर ज़िन्दगी ऐसे ही निकल जायेगी एक दिन!!..चलो आज दुनिया के सारे rules तोड़के अपने मन का करें और जो ख्वाब कभी बन्द कमरे में देखे थे उन्हें बाहर निकलके पूरा करें...चलो आज अपनी ज़िन्दगी अपने शर्तों पे जीयें.. क्यूँकि एक ही तो ज़िन्दगी मिलती है दोस्तों, चलो उसे जीकर ही मरें!!  कभी सोचते हैं, कि हम इतना क्यूँ सोचते हैं, अपनी हसरतों का गला क्यूँ घोंटते हैं... "लोग क्या कहेंगे", इस बनावटी दलील की चट्टान से, अपनी हस्ती को क्यूँ झोंकते हैं... कभी सोचते हैं, कि हम इतना क्यूँ सोचते हैं... क्यूँ ना कुछ ऐसा कर जाएं, जो सबसे अलग हो, जिससे दुनिया को नहीं, बल...

याद है...

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watch the video तुझसे वो पहली बार मिलना याद है,  एक अन्जान शहर में अपनी जान से मिलना याद है, जीते तो हम पहले भी थे, मगर तेरे आते ही दिल की बेजान धड़कनों का फिर से चलना याद है .. हाथों में हाथ लिए जब घूमा करते थे समन्दर के किनारे, तब वो तेरा इन ज़ुल्फों को प्यार से सहलाना याद है, बातों बातों में सुबह से रात और रात से फिर सुबह हो जाना याद है, तेरी बाहों के घेरे में सुकून से सो जाना याद है, वो सितारों की चादर तले तेरा इज़हारे मोहोब्बत भी याद है.. तेरी आँखें जब इस दिल में उठते जज़बातों का सबब पुछती थीं, तब हमारा शरमाकर ख़ामोश रह जाना भी याद है.. तुझसे मिले अरसा हुआ अब, तू हमनवा से हमनफस हुआ अब, मगर तेरा आज भी छूना जैसे लगता पहली बार है.. हाँ, तुझसे वो पहली बार मिलना याद है...

ख़ुशी की फ़िराक़

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किस खुशी की फ़िराक़ में खानाबदोशों से फिरते हो, जब बच्चे थे तो एक खिलौना पाकर ही चहक जाते थे, अब जो सयाने हो गए हो तो सारी कायनात मिलने पर भी गुमसुम रहते हो.. सुनो तो, किस जल्दी में हमेशा होते हो, वक़्त का काँटा तो चलता ही रहेगा, तुम तो दो पल रुक कर इस लम्हे का लुत्फ़ उठाओ... जिस खुशी को तुम नायाब समझते हो ना, उसे अपने घर में ही ढूँढो ज़रा, हर कोने में उसका निशान पाओगे... उस फ़लक के चाँद को पाने की ख्वाहिश में, क्यूँ इस ज़मीन पे गिरती चाँदनी को अनदेखा करते हो... बताओ तो किस खुशी की फ़िराक़ में तुम खानाबदोशों से फिरते हो... चलो आज फ़र्ज़ के धुँए में गुमशुदा उस बेपरवाह बचपन की गलियों का एक चक्कर लगाएं, उस कागज़ की कश्ती को एक बार फिर से बारिश के पानी में चलाएं, माँ की गोदी में सर रखकर परियों की दुनिया की सैर कर आएं, बहुत अरसा हुआ दोस्तों के साथ हँस खेलके, चलो आज उनसे बेवजह की गप्पें लड़ाएं.. हर रोज़ सुबह office की जँग की तैयारी में इस कदर मसरूफ़ रहते हो, आओ ज़रा balcony में उगते सूरज के नीचे सुकून से गरम चाय की चुस्की लगाएं... Ac वाले कमरों में रोज़ अपनी स...

हार से क्यूँ डरते हो...

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हार से क्यूँ डरते हो, हार तो वो सिखलाती है, जो कामयाबी कभी सिखा नहीं पाती है, ये तो मिट्टी को भी सोना कर जाती है, ज़िन्दगी जीने का सही रास्ता बतलाती है... तुम हार से क्यूँ डरते हो... समझते हो जिसको मौत तुम, वो तुम्हारा एक नया जन्म है, तुम्हारे वजूद को बनाने का एक नया कर्म है... तुम्हे लगती हैं जो बेड़ियाँ, वो शुरुआत है उड़ान की, आसमान को छूने के निशान की... अगर लगता है कि ये तुम्हें वहीं ले आयी है, जहाँ से तुमने सफ़र शुरू किया था, तो सोच लो कि ये तुम्हे कुछ समझाती है, और तुम्हारी कमियाँ आईने में दिखलाती है... तो ज़रा ठहरो दो पल आराम करो, अपनी कमियों पे कुछ काम करो... आज जिसके कहर से हताश हो, कल उसके तेज से चमक जाओगे, और आगे ही आगे बढ़ते जाओगे, फिर मुश्किलों के सागर से, जीत के मोती ढूँढकर लाओगे... इसलिए हार से मत घबराओ तुम, और इसे हँस कर गले लगाओ तुम, क्यूँकि जब हारने के बाद तुम कामयाबी छूने जाओगे, तो उसकी सच्ची कदर कर पाओगे.. बोलो, हार से क्यूँ डरते हो... "Fail harder, fail successfully...

मेरी दिल्ली

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आज हम दिल्ली की pollution, या फिर उसमें बढ़ते crime की बात करते हैं, मगर कभी दिल्ली को उस लड़की की नज़र से देखो जो वहाँ पली बढ़ी है, और जो पूरी दुनिया में उसे दिल में लिए घूम रही है.. वो कहते हैं ना, कि "आप एक शक़्स को दिल्ली से तो निकाल सकते हो पर, उस शक़्स में से दिल्ली नहीं निकाल सकते"...ये कविता मैंने तब लिखी जब मैं इस बार घर से वापस आयी.. मैं इस बार दिल्ली तीन साल के बाद गयी थी मगर  मुझे कभी ऐसा लगा ही नहीं जैसे में इतने अरसे से यहाँ थी ही नहीं.. मानो जैसे कल की ही बात हो... तब मुझे एहसास हुआ कि मैं तो शायद कभी दिल्ली छोड़ के गयी ही नहीं थी क्यूंकि मेरा दिल तो अभी भी यहीं था..बस इन्ही जज़्बातों को इस कविता में पिरोया है.. उम्मीद करती हूँ आपको पसंद आएगी और जो भी अपने शहर से दूर है, वो इससे relate करेगा... आज फिर हम दिल्ली से रूबरू हुए, कई साल के बाद ही सही, आज हम फिर से मसरूर हुए, हाँ, आज हम अपनी दिल्ली से रूबरू हुए.. लोगों की शक़्ल बदल गई है लेकिन, उन गलियों की रौनक तो वही है, घर की दीवारों पे ताज़े रंग हैं, मगर गूंज तो वही है, आँगन की मट्टी कुछ सूख गई है ...