हार से क्यूँ डरते हो...



हार से क्यूँ डरते हो,
हार तो वो सिखलाती है,
जो कामयाबी कभी सिखा नहीं पाती है,
ये तो मिट्टी को भी सोना कर जाती है,
ज़िन्दगी जीने का सही रास्ता बतलाती है...
तुम हार से क्यूँ डरते हो...

समझते हो जिसको मौत तुम,
वो तुम्हारा एक नया जन्म है,
तुम्हारे वजूद को बनाने का एक नया कर्म है...
तुम्हे लगती हैं जो बेड़ियाँ,
वो शुरुआत है उड़ान की,
आसमान को छूने के निशान की...
अगर लगता है कि ये तुम्हें वहीं ले आयी है,
जहाँ से तुमने सफ़र शुरू किया था,
तो सोच लो कि ये तुम्हे कुछ समझाती है,
और तुम्हारी कमियाँ आईने में दिखलाती है...
तो ज़रा ठहरो दो पल आराम करो,
अपनी कमियों पे कुछ काम करो...
आज जिसके कहर से हताश हो,
कल उसके तेज से चमक जाओगे,
और आगे ही आगे बढ़ते जाओगे,
फिर मुश्किलों के सागर से,
जीत के मोती ढूँढकर लाओगे...

इसलिए हार से मत घबराओ तुम,
और इसे हँस कर गले लगाओ तुम,
क्यूँकि जब हारने के बाद तुम कामयाबी छूने जाओगे,
तो उसकी सच्ची कदर कर पाओगे..
बोलो, हार से क्यूँ डरते हो...

"Fail harder, fail successfully...


Comments

Popular posts from this blog

The Goddess Within: Mental Health Reflections Through 9 Days of Navratri

Ten Years, One Dream: Lessons from My PhD Journey

Passion Unleashed: Illuminating the Path to Mental Health and Substance Use Transformation