चारदीवारी



आजकल हमने चारदीवारी में क़ैद होकर,
एक गज़ब का काम करना सीख लिया,
पहले तो हवा से बातें किया करते थे,
आजकल खुद से ही बातें करना सीख लिया...
कभी लोगों के काफ़िले में चला करते थे,
आजकल अकेले ही चलना सीख लिया...
चंद रोज़ पहले फ़र्ज़ के शोर में अपनी ही धड़कनों की आवाज़ सुनाई नहीं देती थी,
आजकल हमने अपनी एक एक धड़कन का साज़ सुनना सीख लिया...
घड़ी के काँटों पर अपना हक़ समझ बैठे थे,
आजकल हर लम्हे की क़दर करना सीख लिया..
पहले तो सिर्फ़ चाँद से दोस्ती किया करते थे और आसमान में उड़ा करते थे,
आजकल तो हमने ज़मीन पे रहकर सूरज को भी दुआ सलाम करना सीख लिया..
कभी तो दिन के उजाले की ताज़गी से ये होंठ खिल जाते थे,
आजकल तो रात के आईने में देखकर भी मुस्कुराना सीख लिया...
चंद रोज़ पहले ज़िंदगी का बहाव कुछ धीमा सा लगा करता था,
आजकल तो कतरे कतरे सी बहती इस ज़िंदगी का भी शुक्रगुज़ार होना सीख लिया...
इस चारदीवारी के ठहराव ने हमें वो सिखा दिया जो बादलों की रफ़्तार ना सिखा सकी,
तभी तो हमने सब्र का बाँध बनाना सीख लिया..
हाँ, हमने इस चारदीवारी की हर ईंट से मोहोब्बत करना सीख लिया..

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