सर्दियाँ




इस बार कुछ ऎसी कड़ाके की सर्दी आयी है जनाब,
कि रज़ाई से निकलने का दिल ही नहीं करता,
और गरम चाय की प्याली से मन ही नहीं भरता,
कुछ इस तरह कोहरे ने धूप को छिपा रखा है,
मानो जैसे किसी राज़ को दबा रखा है...
उसपर इस बिन मौसम की बरसात ने तो,
बस गज़ब ही ढा रखा है...
बर्फ भी वक़्त वक़्त पर,
ज़मीन को यूँ ढक जाती है,
जैसे किसी ने सफ़ेद चादर बिछा रखी है...
इन सर्दियों ने तो बस कहर ही ढा रखा है...



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