उम्मीद की किरण



अजब सा समा आया है,
हर दिल में एक खौफ़ सा छाया है,
गली गली में सन्नाटा घिर आया है,
जो शहर कभी रौशनियों में पनपा करते थे,
आज अंधेरों में डूब रहे हैं,
जो लोग मस्ती में घूमा करते थे,
आज अपने घरों में हिफाज़त ढूँढ रहे हैं,
उस ख़ुदा का कहर इस कदर बरस के आया है...
मगर इस सियाह अंधेरे में भी एक उम्मीद की किरण सी दिखती रहती है,
कभी ख़्वाब सी तो कभी हक़ीक़त सी,
मग़र कहीं तो चमकती है,
घने बादलों का कोहरा कभी तो छट जाएगा,
ये दिल बार बार कहता है,
वो पहला सा समा फिर से आएगा,
बस यही भरोसा देता रहता है...

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