इश्क़ के शहर का बाशिंदा




इश्क़ के शहर का बाशिंदा इस दिल में आशियाना ढूँढता है,
इन बियाबान गलियों में प्यार का फ़साना ढूँढता है,
ज़र्रे ज़र्रे में ज़िन्दगी का तराना ढूँढता है,
हाँ, इश्क़ के शहर का बाशिंदा इस दिल में आशियाना ढूँढता है..

कुछ झूमता सा, कुछ मचलता सा,
और कुछ मदहोशी में बहकता सा,
अपनी तिशनगी बुझाने के बहाने ढूँढता है,
राहों से भटक गया है शायद,
तभी तो सेहरा में बहारों की निशानियाँ ढूँढता है...

क्या पायेगा इस दीवानगी से,
तनहाईयों की आग में झुलस जाएगा,
या इन बेज़ार आँखों में खो जाएगा,
फिर अपनी बेबसी लेकर किसका दरवाज़ा खटखटाएगा,
ये इश्क़ के शहर का बाशिंदा कहाँ जाएगा...

अब तो बस यही है फ़रियाद ख़ुदा से,
कि इसे भी इसके दीवानेपन का सिला मिले,
इसकी राहों में भी प्यार के फूल खिलें,
और अपनी मंज़िल का निशान मिले,
अब तो बस यही है जुस्तजू इस दिल में,
कि इसे भी मोहोब्बत का फ़रमान मिले,
क्यूँकि इश्क़ के शहर का इक बाशिंदा इस दिल में आशियाना ढूँढता है,
इन बियाबान गलियों में प्यार का फ़साना ढूँढता है,
हाँ, इश्क़ के शहर का इक बाशिंदा...

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